Home Shubh Muhurat 2020 | शुभ मुहूर्त 2020 Vivah Muhurat 2020 | विवाह मुहूर्त 2020

Vivah Muhurat 2020 | विवाह मुहूर्त 2020

shubh muhurat

शुभ विवाह मुहूर्त यानी Auspicious Vivah Muhurat क्या है ?

शुभ हिंदू विवाह मुहर्त Vivah Muhurat 2020, और उनको तिथियों को खोजना काफी लम्बी प्रक्रिया है. इस प्रक्रिया को समझने के लिए इस लेख में इस विषय पर प्रकाश डालना जरुरी है. विवाह मुहूर्तों की गणना करते वक्त कौन से कारणों पर विचार करना जरुरी है, और कौनसे करणों पर विचार करना जरुरी नहीं है.

सौर मास की गणना –

विवाह मुहूर्तों Vivah Muhurat 2020, के चुनाव में, केवल सौर महीनों को ही चातुर्मास को छोड़कर गणना की जाती है, जो कि चार चंद्र मास की अवधि होती है, माना जाता है, इस वक्त भगवान विष्णु के सोने का समय होता है.

दक्षिण और उत्तर भारत में अलग अलग विवाह तिथियों को प्रकाशित किया जाता है. हालांकि विवाह मुहूर्तोंको निर्धारित करने के लिए सिर्फ सौर महीनों को माना जाता है. चंद्र और सौर महीनों के लिए विवाह मुहूर्त, Vivah Muhurat 2020 अलग अलग नहीं होने चाहिए.

चंद्र मास को पुर्णिमांत नहीं माना जाता. वैसे बंगाली, तमिल मल्यालम मास सौर मास माने जाते है. मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार, सूर्य का गोचर विशिष्ट राशियों से होने पर ही विवाह का आयोजन करना करना योग्य माना जाता है.

इन राशियों के लिए विवाह मुहूर्त शुभ

मेष, वृषभ, मिथुन, वृश्चिक, मकर, कुंभ इन राशियों से सूर्य के गोचर में विवाह का आयोजन करना योग्य शुभ माना जाता है.

कर्क, सिंह, कन्या, तुला, धनु, मीन, इन राशियों से सूर्य का गोचर हो तो विवाह के लिए अयोग्य माना जाता है.

विवाह मुहूर्तों Vivah Muhurat 2020, के लिए केवल सौर महीनों को माना जाता है. हालाँकि विवाह की रस्में अधिका मास, क्षय मास और चातुर्मास के दौरान आयोजित नहीं की जाती हैं. पितृ पक्ष या महालया श्राद्ध काल जो शुभ कार्यों के लिए निषिद्ध है, चातुर्मास के दौरान आता है.

विवाह के लिए शुभ नक्षत्र

विवाह के लिए 4 करण निषिद्ध है – विष्टी, शकुनी, चतुष्पाद, नगवा

ऊपर दिए सभी प्रतिबंधित करण पति और पत्नी की मृत्यु का कारण बन सकते हैं. इन करणों के दौरान आयोजित विवाह के परिणाम स्वरूप परिवार का विनाश हो सकता है और अचानक अप्रत्याशित परिणाम भी हो सकते हैं.

शेष करण, किंसुघ्न, बावा, बलव, कौलव, तैतिला, गरजा, वनिजा विवाह कार्यों के लिए शुभ माने जाते हैं.

तिथि, वार और सप्ताह :

विवाह के लिए सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार शुभ माने जाते हैं। मंगलवार को विवाह के लिए शुभ नहीं माना जाता है.

अब बात करते है, तिथि की, द्वितीया (२), तृतीया (३), पंचमी (५), सप्तमी (७), एकादशी (११) और त्रयोदशी (१३) तीथि विवाह के लिए शुभ मानी जाती हैं, तथा रिक्त तिथि जैसे चतुर्थी (४), नवमी (९), चतुर्दशी (१४) इनको विवाह के लिए अशुभ माना जाता है, और इनसे दूर रहना चाहिए.

विवाह मुहूर्तों का चयन करते समय तिथि और सप्ताह के दिनों को कम महत्वपूर्ण माना जाता है. इसलिए हमारे विवाह की गणना शुभ विवाह तिथियों को खोजने के लिए पंचांग शुद्धि करते हुए सप्ताह और दिन को नहीं मानते हैं.

यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि अक्षय तृतीया, प्रबोधिनी एकादशी और मकर संक्रांति के अधिकांश दिन शुभ विवाह के दिनों में आते हैं लेकिन यह हमेशा सही नहीं होता है.

लग्न का चयन

पंचांग शुद्धि के बाद शुभ मुहूर्त के दौरान विवाह करना उचित होता है. पूर्व दिशा में आने वाली राशि को लग्न कहा जाता है. अलग-अलग स्रोतों में शुभ लग्न के चयन पर अलग-अलग राय हो सकती है.

अधिकांश स्रोतों का मानना ​​है कि मिथुन, कन्या और तुला विवाह का आयोजन करने के लिए शुभ मुहूर्त माने जाते हैं.

अशुभ लग्न के दौरान आयोजित होने वाले विवाह से काम धंदे में नुकसान हो सकता है, व्यभिचारी और कुलटा पत्नी, एक से अधिक बच्चे पैदा करने में असमर्थ और दांपत्य जीवन में अस्थिरता निर्माण हो सकती है.

विवाह मुहूर्त को निर्धारित करते समय हमें यह ध्यान रखना आवश्यक है, की शुभ लग्न समय कम से कम ४ – २ घंटे का हो, और लग्न स्थान भी निर्देशित करता हो, लग्न का समय कम होने के कारन, अशुभ लग्न का सामना कर पड़ सकता है.

शुक्र और गुरु का अस्त होना

शुक्रा तारा और गुरु तारा अस्त होने पर विवाह सहित अधिकांश शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं. इसलिए शुक्र और बृहस्पति का अस्त होने पर कोई विवाह नहीं होता है.

सिंहस्थ गुरु

गुरु का सिंह गोचर भी विवाह के लिए अशुभ माना जाता है. इसे ठीक से समझना जरुरी है, गुरु 12 से 13 महीने तक सिंहस्थ बन जाता है, जिससे लगभग एक साल तक शादी करना मुश्किल हो जाता है. हालाँ कि विवाह सिंहस्थ गुरु के दौरान किया जा सकता है जब सूर्य मेष राशी से गोचर कर रहा हो.

होलाष्टक

उत्तर भारत में होलाष्टक के दौरान भी विवाह करना अशुभ माना जाता हैं। होलाष्टक आठ दिनों की अशुभ अवधि है जो अष्टमी तिथि से फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष से शुरू होती है और फाल्गुन पूर्णिमा पर समाप्त होती है. हमारी विवाह मुहूर्तोंकी गणना होलाष्टक को नहीं मानती हैं.