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ग्रह परिचय : नौ ग्रहों में बुध का महत्व और बुध के द्वारा बने ज्योतिष योग

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बुध नौ ग्रहों मे युवराज है. बुध को बुद्धि का दाता भी कहा जाता है, मिथुन और कन्या राशि, बुध की स्वयं की राशि है, इसके साथ ही बुध अपनी स्वयं की कन्या राशि में उच्च के हो जाते है. शुक्र और सूर्य बुध के मित्र है, तथा सूर्य के साथ वे अपनी कन्या राशि में १५ अंश पर बुधादित्य योग बना देते है. शनि, मंगल और गुरु को यह सम मानते है. बुध जिस भी ग्रह के प्रभाव में आते है, उसी के अनुसार शुभ या अशुभ फलदयी हो जाते है. जातक के विचार और निर्णय क्षमता, विवेक, मित्र, संपर्क क्षमता आदि विषय में कुंडली में बुध की स्तिथि से आकलन किया जा सकता है.

यह सूर्य के सबसे निकट भ्रमण करनेवाला ग्रह है, यह लगभग ८८ में सूर्य की परिक्रमा पूर्ण करता है. प्राचीन ज्योतिष आचार्योने बुध का इस प्रकार का वर्णन किया गया है. जो कुंडली फलित में उपयोग किया जाता है. सुन्दर देह, हास्य प्रिय, मधुर वाणी, हरित वर्ण, स्पष्ट वक्ता, इसे काल पुरुष की वाणी कहा गया है, पांडित्य, वाक्शक्ति, कला में निपुण, लेखन, गणित आदि कार्य का विचार बुध से किया है.

बुध से सम्बंधित व्यवसाय

सभी प्रकार के लेखन कार्य, कवी, लेखक, पत्रकार, अख़बार, संपादक, क़िताबों से सम्बंधित व्यवसाय, वाणी, वाणी से सम्बंधित व्यवसाय, गायक, वक्ता, सभी प्रकार के संपर्क के माध्यम, आदि विषय बुध के कारकत्व में आती है.

बुध की प्रगल्भता

बुध से बुद्धि और गुरु से ज्ञान देखते है. इसलिए बुध का ज्ञान गुरु के मुकाबले ज्यादा प्रबल नहीं होता है. बुध बिना किसी सूत्र या नियम के अपने तर्क पर चलने वाला ग्रह है.

बुध से होने वाली बीमारियाँ

बुध कफ दोष, वाणी रोग, त्रिदोष और पांडुरोग (पीलिया) आदि रोग देता है, बुध जब अशुभ फल देता है, तो जातक के दांत झड़ने लगते हैं. सूंघने की शक्ति क्षीण होने लगती है. संभोग शक्ति क्षीण हो जाती है एवं बोलते समय जातक हकलाने लगता है.

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बुध का वैदिक मंत्र
ऊँ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रतिजागृहि त्वमिष्टापूर्ते स सृजेथामयं च ।
अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन्विश्वे देवा यजमानश्च सीदत ।।

बुध का पौराणिक मंत्र
प्रियंगुकलिकाश्यामं रुपेणाप्रतिमं बुधम ।
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम ।।

बुध गायत्री मंत्र
ऊँ चन्द्रपुत्राय विदमहे रोहिणी प्रियाय धीमहि तन्नोबुध: प्रचोदयात ।

बुध का नाम मंत्र
ऊँ बुं बुधाय नम:

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