ग्रह परिचय : नौ ग्रहों में बृहस्पति का महत्व, और बृहस्पति के द्वारा बने योग

ग्रह परिचय | January 28, 2019, 11:28 am | Jyotish Guide
ग्रह परिचय : नौ ग्रहों में बृहस्पति का महत्व, और बृहस्पति के द्वारा बने योग

गुरु यानि बृहस्पति का नौ ग्रहों में गुरु का स्थान है, इसलिए इस ग्रह को गुरु भी कहा जाता है. ब्रम्हांड में घटने वाली सभी शुभ घटनाओं का गुरु को कारका कहा जाता है. गुरु को ज्ञान, शिक्षा, शिक्षक, धर्म, बड़े भाई, दान, परोपकार, संतान, सभी प्रकार की पिली रंग की वस्तुए, चने की दाल, पिले वस्त्र, केले का पेड़ आदि का कारक माना जाता है. नौ ग्रहों की तुलना में गुरु की गति एक राशि में लगभग १३ महीनों की होती है. गोचर में जिस राशि में गुरु प्रवेश करता है, उस राशि के लिए यह अवसर अत्यंत शुभ फलदायी होता है.

गुरु के अधीन व्यवसाय

गुरु को धर्म, और ज्ञान का कारक माना जाता है. न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट, वकील, बैंक मैनेजर, कंपनी का मैनेजिंग डायरेक्टर, ज्योतिषी और शिक्षक आदि बृहस्पति ग्रह के प्रतीक हैं, तथा किताबों का व्यवसाय, शिक्षा और धर्म संबंधी पुस्तकें, वकालत, शेयर मार्केट, और शिक्षा संस्थाओं का संचालन आदि गुरु के प्रतीक रूप व्यवसाय हैं. आर्थिक लेन देन करने वाली कंपनी और अर्थ मंत्रालय भी गुरु के प्रतीक हैं.

गुरु के भाव, राशि तथा मित्रता

गुरु के साथ मंगल, सूर्य, चंद्रमा तथा केतु मित्र ग्रह माने जाते है. बारा राशियों में धनु और मीन राशि गुरु की स्वराशि है, तथा कर्क राशि में गुरु उच्च के हो जाते है, गुरु धर्म या ज्ञान भाव का कारक होने के कारण, गुरु शिक्षा के पंचम, धर्म का नौ वे भाव में श्रेष्ट फल प्रदान करते है.

शुभ घटनाओं का कारक गुरु

शुभ घटनाओं का कारक गुरु विवाह, मुंज आदि धार्मिक विधि के लिए कुंडली में गुरु का गोचर भ्रमण देखा जाता है. जैसे ही गुरु ग्रह जातक की कुंडलीके सप्तम भाव से गोचर भ्रमण करता है, जातक को विवाह के प्रस्ताव आना शुरू हो जाता है. तथा इसी गोचर भ्रमण में जातक का विवाह आदि शुभ कार्य भी पूर्ण हो जाते है.

गुरु वृद्धि करनेवाला ग्रह

गुरु को संचय करने वाला, या वृद्धि करने वाला ग्रह कहा जाता है, जैसे ही गोचर भ्रमण से गुरु की शुभता बढ़ जाती है, गुरु अपने कारकत्व के अधीन आने वाली सभी प्रकार की वृद्धि करना शुरू करता है. जैसे की संपत्ति में बढ़ोतरी, किसी ना किसी प्रकार के ज्ञान में वृद्धि, यही एक कारण है की गुरु जब कुंडली में रोग भाव यानी षष्ट से संबंध बनाता है, तो गुरु वृद्धि करने वाले रोग भी देता है. यहाँ पर गुरु अपना स्थायी स्वभाव बरकार रखता दिखाई देता है. कुंडली में गुरु ग्रह पीड़ित या निर्बली होने पर गुरु के कारकत्व में आने वाले शुभ फलो में कटौती करता है.

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